रत्न परामर्श
रत्न धारण के शास्त्रीय नियम: कब अमृत और कब बन जाता है विष?
आचार्य दयानिधि मिश्र•१५ जनवरी २०२६•पठन समय: ४ मिनट
रत्न सौरमंडल के विशिष्ट ग्रहों की सूक्ष्म किरणों (Cosmic Rays) को ग्रहण कर हमारे शरीर के चक्रों तक पहुँचाते हैं। अतः यह अत्यंत आवश्यक है कि रत्न केवल कुंडली के 'योगकारक' एवं 'इष्ट' ग्रहों का ही पहना जाए।
यदि कोई मारक (६ठे, ८वें या १२वें भाव के स्वामी) का रत्न पहन ले, तो वह जीवन में भयंकर दुर्घटना, स्वास्थ्य हानि या आर्थिक तबाही ला सकता है।
रत्न हमेशा प्राकृतिक, दोषमुक्त एवं अभिमंत्रित होना चाहिए। उसकी सही रत्ती, उचित धातु और शुभ नक्षत्र में प्राण-प्रतिष्ठा ही अभीष्ट फल प्रदान करती है।
श्री
आचार्य दयानिधि मिश्र
वरिष्ठ वैदिक ज्योतिषाचार्य एवं वास्तु विशेषज्ञ, श्री निधि ज्योतिष कार्यालय, शिवपुर, वाराणसी।